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: 👉युवा पीढ़ी को नेत्र दान के लिए प्रेरित करती आचार्य श्री भिक्षु सरकारी अस्पताल मोती नगर नई दिल्ली के कोरोना योद्धा की मार्मिक कहानी ::== एक बार जरूर पढे कहानी
September 11, 2020 • Sun India Tv News चैनल • राष्ट्रीय

👉: डब्बू बड़ी देर से उस हरे तोते को आसमान में उड़ते हुए देख रहा था।

उसके दादाजी ने पूछा बेटा क्या हुआ ? क्यों उदास हो ? डब्बू बोला काश मेरे भी पंख होते तो मैं भी इस खुले आसमान में उड़ता और आसमान का राजा बन कर तारों को अपने पास बुलाता ।

डब्बू के दादाजी ने कहा बेटा जानते हो यह तारे कौन है ?डब्बू की आंखों में नहीं के भाव आ गए ।

दादा जी ने बताया यह तारे हमारे पूर्वज की तरह है, जो धरती पर रास्ता भटक गए लोगों को राह दिखाते हैं ।

बाल बुद्धि का डब्बू बोला ... दादाजी ... जिनको आंखों से दिखाई नहीं देता उनको यह तारे कैसे राह दिखाएंगे ?

डब्बू के प्रश्न में बाल सुलभता थी ।दादा जी बोले डब्बू बेटा उसके लिए कुछ अच्छे लोग तारा बनने से पहले इसी दुनिया में अपने नेत्रों का दान करके जाते हैं ।

जिनकी सहायता से हजारों नेत्रहीन लोग रोशनी प्राप्त करते हैं और इस खूबसूरत रंगो से भरी दुनिया को देखते हैं ।

क्या दादाजी जीते जी नेत्र दान संभव है ?हा बेटा ,,, दादाजी की आंखों में चमक के भाव थे ।

दादा जी बोले,,, हां _अगर कोई भी नेत्र अस्पताल से नेत्रदान का फॉर्म भर कर यह घोषणा करें कि उसकी मृत्यु के पश्चात उसकी आंखें दान कर दी जाएं तो यह संभव है ।

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क्या दादा जी आपने भी नेत्रदान किया है ?हां बेटा मैंने भी नेत्रदान किया है पर इसकी जिम्मेदारी तुम्हारे कंधों पर है ।वह कैसे दादाजी ?

बेटा हमारे देश में मृत्यु के पश्चात दुख के माहौल में लोग इस तरह की बातें पसंद नहीं करते , और नेत्रदान भी नहीं करने देते ,जब की मृत्यु भोज व तेरहवीं संस्कार से अच्छा है नेत्रदान किया जाए, ताकि मृतक की आंखें दोबारा किसी को दृष्टि दे सकें ।

जबकि इस तरह का दान महादान कहलाता है ।दादाजी नेत्रदान में आंखें बाहर निकाल लेते हैं क्या ? डब्बू ने पूछा ।

बेटा समाज की भ्रांति यह है कि डॉक्टर दान वाली आंख निकाल लेते हैं जबकि ऐसा नहीं है डॉक्टर सिर्फ गोल काली कार्निया की पतली झिल्ली ही निकालते हैं ।

अब तो नई वैज्ञानिक विधि से दो आंखों की कॉर्निया से चार लोगों को रोशनी मिल सकती है ।

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डब्बू बेटा कल चलो मैं तुम्हें नेत्रहीन लोगों से मिलवा कर लाता हूं , जिन्हें समाजिक संरक्षण के साथ में आंखों की रोशनी की बहुत ज्यादा जरूरत है ।

डब्बू अपने दादाजी के साथ नेत्रहीन कैंप में गया वहां काफी लोग ऐसे थे जिनके पास ज्ञान का भंडार था, परंतु नेत्र ना थे ,उन्होंने कभी भी बाहर की रंगीन दुनिया नहीं देखी थी ,सिर्फ स्पर्श किया था ऐसे लोगों को देखकर बाल्यावस्था का डब्बू द्रवित हो गया वह नेत्रहीनों के लिए उसके मन में सम्मान का भाव जागृत हो उठा ।

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यह सब देखकर उसने दादाजी को वचन दिया कि दादाजी अब से मेरा एक लक्ष्य भी है--.....

नेत्र दान करवाना है l सबको दृष्टि दिलाना है ।

घर घर अलख जागना है तो नेत्र-दान करवाना है l l ।।

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*सात* *वर्ष* *उपरांत* ............

दादाजी बिस्तर पर लेटे हुए शून्य में देख रहे थे, उनके अधर बोलने की चेष्टा में व्याकुल थे ,परंतु मुख से आवाज नहीं निकल रही थी ।

घर में बेटे बहू सब पिताजी के ठीक होने की आस लगाए ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे .......

डब्बू अपने दादाजी को अपलक निहार रहा था उसको लग रहा था दादाजी की आंखें उसकी ओर देखकर जैसे कुछ संदेश दे रही हो........

डब्बू अब 18 वर्ष का था सच्चाई को भलीभांति समझता था .....दादा जी के पढ़ाए पाठ का वक्त लगता है अब आ गया ।

बचपन में सुनाई हरे तोते वाली कहानी को साकार करने का समय आ गया था, वह अपने पंखों पर तो नहीं पर दादा जी के सपनों को पंख लगा सकता था,

मुख में गंगाजल डालते ही दादाजी तारों के पास कभी ना लौट कर आने के लिए चले गए थे .!!

पर उनकी आखिरी इच्छा डब्बू के कंधों पर थी ,,डॉक्टर 1 घंटे में पहुंच गए थे ,काफी रिश्तेदारों को डब्बू ने दादाजी की इच्छा के बारे में अवगत करा दिया था ।

पिताजी माताजी अश्रुपूरित आंखों से अपने बाबूजी की नेत्रदान प्रक्रिया को पूरा होते देख रहे थे ।उन्हें अपने बाबूजी के लाडले पर गर्व था ।

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निकल पड़ा इकतारा बनने दो तारों को छोड़कर ।।

दूर किनारे खड़ा था डब्बू पिता से कंधा जोड़कर ।।

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बी एम एम सिंह

                        (दंत स्वास्थ्य विज्ञानी) 

आचार्य श्री भिक्षु सरकारी अस्पताल मोती नगर नई दिल्ली